मोदी सरकार सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी क्यों बेच रही है ? क्या सारी सरकारी कंपनिया प्राइवेट हो जाएगी ?

  1. त्रिवेणी स्ट्रक्चरल्स लिमिटेड:- एक बहुत बड़ी हैवी इंजीनियरिंग कंपनी जो आस्ट्रिया के सहयोग से लगाई गई। छह हजार कर्मचारी कभी काम करते थे। विदेशों से मशीनें मंगाई गई। नेताओं ने अपने लोगों को नौकरियाँ दिलवा कर वोट बैंक सुरक्षित किया।शुरू के पाँच सालों में इतना घाटा हुआ आस्ट्रिया को कंपनी छोड़ के भागना पड़ा। नेताओं अफसरों ने आसपास छोटे बड़े वर्कशॉप लगा लिए और कंपनी का काम आउटसोर्सिंग करवा के मात्र पच्चीस साल में कम्पनी में लगे हजारों करोड़ बरबाद हो गए। कर्मचारियों को वीआरएस देने के अलावा कोई चारा नहीं।1969–2010 तक यह कंपनी सरकार के हजारों करोड़ बरबाद कर चुकी थी। सरकारी कर्मचारी हैं निकाल नहीं सकते। तनख्वाह देने के लिए पैसे नहीं हैं। मशीनें किराए पर दे देकर सिक्योरिटी का खर्च पूरा होता था। एक पीढ़ी को रोजगार मिला दूसरी पीढ़ी तक कंपनी डूब गई।
  2. एयर इंडिया:- इलाहाबाद से दिल्ली एक ही फ्लाइट थी एयर इंडिया की किराया ₹10000। इंडिगो की फ्लाइट शुरू हो गई तो किराया ₹3000 ऐसा क्यूँ होता है? पिछले 10 सालों में एयर इंडिया को सरकार एक लाख करोड़ की आर्थिक सहायता दे चुकी है। अभी भी तीस हजार करोड़ घाटे में है। कुछ हजार सरकारी कर्मचारियों के लिए हम कितना कष्ट सहेंगे।
  3. इंडिया जिंक लिमिटेड:- 2000 में इस कंपनी की 49% हिस्सेदारी700 करोड़ में बेच दिया। बची हुई 30% हिस्सेदारी आज 35000 करोड़ की कीमत की है।

ऐसी कहानियां हजारों हैं मायावती मुलायम सिंह चौटाला ने घूस लेकर लाखों शिक्षकों को नियुक्त कर दिया।

आज उन अक्षम अयोग्य शिक्षकों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था का वो हाल किया है कि ग्रामीण अंचलों के शिक्षित बच्चे वस्तुतः सिर्फ साक्षर हैं। 

अंत में शिक्षामित्रों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को नया आयाम दे दिया है। 

ग्राम प्रधान के परिवार के अयोग्य बच्चे और परिजनों की फौज आज यूपी की शिक्षा व्यवस्था चला रही हैं। कभी मैकाले ने हमारी शिक्षा व्यवस्था का सत्यानाश किया था आज हमारी राजनेता कर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था भी निजीकरण की भेंट चढ़ चुकी है।

निजी कान्वेंट स्कूल और कोचिंग संस्थानों ने शिक्षा विभाग के कार्यक्षेत्र का अपहरण कर लिया है। सरकारी अस्पताल मजबूरी की दास्तान बयां करते हैं।

सरकार को सुरक्षा, चिकित्सा,संचार, वित्त, विदेश विभाग के अतिरिक्त और कहीं भी दखल नहीं देना चाहिए। सरकारी विभाग आज अकर्मण्यता अक्षमता अयोग्यता असफलता के प्रतीक बन चुके हैं। सरकारी प्रतिष्ठानों के विनिवेश की प्रक्रिया डाक्टर मनमोहन सिंह ने शुरू करवाई 1991 में जब सरकारी नियंत्रण ने देश को खोखला और दिवालिया कर दिया था।


सरकारी कंपनियों का विनिवेश विकल्प नहीं मजबूरी है।

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