क्या लोग देश की जीडीपी गिरने के बाद भी बीजेपी को 2024 में वोट डालेंगे ! क्यों?
क्या चुनावों के पहले सोनिया गाँधी शाह बुखारी के पास देश की जीडीपी सुधारने जाती थी?
क्या लालू यादव ने माई समीकरण बिहार को हांगकांग बनाने के लिए उछाला था?
क्या द्रविड़ राजनीति या वामपंथी राजनीति देश के किसानों को बिल गेट्स बनाने के लिए की जाती है?
ऊपर पूछे गए सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है, नहीं.
२०१४ से पहले देश की राजनीति जीडीपी, किसान, विदेश नीति, रोजगार इत्यादि पर नहीं बल्कि मुस्लिम वोट बैंक या क्षेत्रीय वोटबैंक पर ही केंद्रित थी.
किन्तु २०१४ में पहली बार कोई पार्टी आई जिसने विकास के नाम पर वोट माँगा.
मोदी तो विकास के नाम पर ही वोट मांग रहा था किन्तु हिन्दू एकजुट हो चुके थे और उन्होंने पहली बार हिंदुत्व के नाम पर वोट देकर अपनी पार्टी को जिताया.
बस तभी से इस देश की सेक्युलर, लिबरल और अर्बन नक्सल गैंग लगातार हिन्दुओं को समझा रही है की भाई, हिंदुत्व के लिए नहीं बल्कि जीडीपी के लिए वोट दो, रोजगार के लिए वोट दो, फिलिस्तीन और टर्की से अपने रिश्ते सुधारने के लिए वोट दो.
लेकिन इस सेक्युलर, लिबरल और अर्बन नक्सल गैंग को यह समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर हिन्दू इनकी बात मान क्यों नहीं रहा और क्यों लगातार मोदी को ही जिताए जा रहा है.
नीचे दिए गए कुछ तर्कों से संभवतः इन गद्दारों को समझ आ जायेगा कि आखिर क्यों २०१४ में भी मोदी ही आएगा.
1. क्या आपने कभी कोई ऐसा व्यक्ति देखा है जो हिन्दुओं से घृणा करता है किन्तु मोदी का बहुत बड़ा प्रशंसक है? नहीं, सारे विश्व में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा.
क्या आपने कभी कोई ऐसा व्यक्ति देखा है जो मोदी से घृणा करता है किन्तु "जय श्री राम" बोलने वाले और गाय को अपनी मान मानने वाले हिन्दू से प्रेम करता है? नहीं, सारे विश्व में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा.
इसका अर्थ यह है कि जो हिन्दुओं का शत्रु है वही मोदी का भी शत्रु है और जो मोदी का शत्रु है वही हिन्दुओं का भी शत्रु है. जिस समय सारा मीडिया, बुद्धिजीवी, सेक्युलर और सारे अर्बन नक्सल हिन्दुओं के खून के प्यासे हैं ऐसे समय में हिन्दुओं को GDP कि चिंता छोड़ कर अपने प्राणों की चिंता करनी चाहिए. मोदी हार गया तो समझो तुम बेमौत मारे जाओगे.
२. मुस्लमान हमेशा आपमें मौलवियों या धार्मिक नेताओं के कहने पर एक जुट होकर एकसाथ किसी एक ही पार्टी को वोट देते आये हैं किन्तु क्या कभी किसी हारने वाली पार्टी ने उनको गाली दी है?
ईसाई ७० वर्षों से कांग्रेस के भक्त रहे हैं यहां तक कि २०१४ में जब सारा देश कांग्रेस के विरुद्ध था तब भी ये लोग कांग्रेस के साथ थे, किन्तु क्या किसी अन्य पार्टी ने उनको गाली दी है?
किन्तु २०१४ में जैसे ही हिन्दुओं ने कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, लेफ्ट इत्यादि के विरुद्ध जाकर मोदी को वोट दिया वैसे ही हिन्दुओं पर गालियों कि बौछार होने लगी. सेक्युलर, लिबरल, अर्बन नक्सल, मीडिया और सभी राजनितिक पार्टियों के द्वारा हिन्दुओं को जाहिल, गंवार, अंधभक्त, मुर्खभक्त, गोबर, संघी, चूतिया, और ना जाने किन किन शब्दों से हिन्दुओं को अपमानित किया जाने लगा. क्या आपने इस गैंग से कभी अंधमुल्ला, मुर्खमुल्ला, कटुआ, ऊंट का मूत पीने वाला, जैसे शब्द सुने हैं? कभी नहीं.
तो मेरा वोट किसको जाना चाहिए? देश को ७० वर्षों से लूट रही उस पार्टी को वोट दूँ जो मुझसे GDP सुधार के झूठे सपने दिखा रही है या जो एकमात्र पार्टी मेरा सम्मान करती है उसको वोट दूँ?

३. जो पार्टियां आज मेरा वोट मांग रही हैं कल तक वही मुझको भगवा आतंकवादी कहती थीं, यही पार्टियां भगवान् राम को काल्पनिक कहती थीं जो आज मुझे राम की कसम देकर GDP के नाम पर मेरा वोट मांग रही हैं. नहीं भाई, मैं अपना सांप्रदायिक और मासूम अल्पसंख्यकों के खून से रंगा हुआ मेरा वोट देकर तुमको बदनाम नहीं करना चाहता.
४. वो लोग इखलाख के साथ खड़े हुए, अंकित सक्सेना के साथ नहीं. वो लोग जुनैद के साथ खड़े हुए, चन्दन गुप्ता के साथ नहीं. वो लोग गौरी लंकेश के साथ खड़े हुए, कमलेश तिवारी के साथ नहीं. वो लोग बाटला हॉउस पर रोये, पालघर पर नहीं.
इसलिए मैं अपना वोट लेकर मोदी के साथ खड़ा हूँ उन लोगों के साथ नहीं.
५. जीडीपी गिर रही है तो क्या मुझे कांग्रेस या लेफ्ट को वोट दे देना चाहिए? तो क्या पेट भर खाने ले लालच में कोई महिला अपने बलात्कारी पर विश्वास कर सकती है? कभी नहीं. तो क्या एक कागज के फूल के लिए माली अपनी हरी भरी बगिया उजाड़ सकता है? कभी नहीं. तो क्या एक खोटे सिक्के के लालच में कोई पिता अपने पुत्र कि हत्या कर सकता है? कभी नहीं. तो क्या देश कि GDP सुधारने के फर्जी वादे कर रही एक ऐसी पार्टी को मैं अपना वोट दे सकता हूँ जो मुझे, मेरे धर्म को और मेरे भगवान् को गाली देती है, अपमानित करती है? कभी नहीं.
भाजपा को छोड़ कर किसी भी अन्य पार्टी को वोट देने का अर्थ यह होगा कि हिन्दू का कोई स्वाभिमान और आत्मसम्मान नहीं होता. वो जिसकी गालियां खाता है उसी को वोट दे देता है.
६. दिल्ली में हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित दंगे हुए तो मेरे साथ कौन खड़ा था, भाजपा या कांग्रेस? बैंगलोर में जिहादियों की भीड़ ने मेरे घर जला दिए तो मेरे साथ कौन खड़ा था, भाजपा या कांग्रेस? कश्मीर में मेरे घर फूंक कर मुझे मेरे ही देश में शरणार्थी बना दिया गया तो मेरे साथ कौन था, भाजपा या कांग्रेस? केरल और बंगाल में मैं मारा गया तो मेरे लिए कौन बोला, भाजपा या कांग्रेस?
तो फिर मुझे किसके साथ होना चाहिए? भाजपा के साथ या कांग्रेस के साथ?
उनको मैं नहीं मेरा वोट चाहिए, उनको मेरी नहीं, अपनी कुर्सी की चिंता है.
उनके आने से देश की GDP चाहे आसमान छू ले, मेरी स्तिथि में तो कोई अंतर नहीं आने वाला क्यूंकि उनके लिए देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है, बाद में अन्य अल्पसंख्यकों का और इसके बाद उनका खुद का. मेरे हिस्से तो बस बची खुची जूठन ही आने वाली है.
उनके आने से मदरसों के लिए अनुदान आएगा, चर्च के लिए डोनेशन आएगा, मौलवियों और पादरियों के लिए पैसा आएगा और मेरे लिए सांप्रदायिक हिंसा निरोधक अधिनियम आएगा जिसके अनुसार प्रत्येक हिन्दू पैदा होते ही अपराधी घोषित कर दिया जायेगा.
यदि मैं ही नहीं रहा तो बढ़ी हुई जीडीपी मेरे किस काम आएगी? यदि मेरा धर्म ही नहीं बचेगा तो धर्मनिरपेक्षता मेरे किस काम आएगी? दो रोटी काम खा लेंगे लेकिन अपने आत्मसम्मान के नाम पर वोट तो मोदी को ही देंगे.
जय श्री राम,
जय हिन्द.
काफी सटीक टिप्पणी की है
ReplyDeleteधन्यवाद
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