कुछ लोग कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी की आकस्मिक मृत्यु के बाद संबित पात्रा को बुरा भला क्यों कह रहे हैं?

12 अगस्त, 2020 को दिल का दौरा पड़ने से उनका असामयिक निधन हो गया है। निधन के बाद कई आरोपों का दौर शुरू हुआ, तो क्या हुआ?

राजीव त्यागी - राजीव त्यागी का जन्म 20 जून 1970 को हुआ था। 50 वर्षीय त्यागी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता थे। जो अक्सर टीवी डिबेट शो में कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।

इनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।



राजीव त्यागी के निधन के बाद सम्बित पात्रा निशाने पर -

राजीव त्यागी के निधन के बाद ट्विटर पर सम्बित पात्रा को ट्रोल किए जाने का सिलसिला शुरू हुआ। कई लोगों ने तो त्यागी के निधन का जिम्मेदार सम्बित को ठहराते हुये दावा किया कि एक निजी चैनल पर उनके निधन से कुछ पल पूर्व बीजेपी प्रवक्ता सम्बित पात्रा द्वारा त्यागी पर कठोर शब्दों में वार किया, जिसे वह सह नहीं सका और सदमे से उनका निधन हो गया।

चित्रः डिबेट के दौरान एंकर सरदाना राजनीतिज्ञ त्यागी और पात्रा।

त्यागी के निधन के बाद एक धड़े ने तो पत्रकारो को भी उनकी मौत का जिम्मेदार मानते हुए मीडिया को नफरत के डिबेट से अभिभूत बता दिया। ऐसे लोगों का मानना है कि त्यागी की मौत मीडिया के इस रवैये के कारण सम्बित के वार से हुई। ऐसे ही ट्वीट की एक पेशकश जिसके लिए पात्रा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

राजीव त्यागी के निधन से एक आम आदमी के नाते सबको गहरा धक्का लगा लेकिन उससे भी ज्यादा धक्का कांग्रेस की नीतियों, स्वघोषित सेक्युलर लोगों की विकृत एवं विचलित मानसिकता से और भी गहरा धक्का लगा है। यह कब वास्तविक दुनिया में आना पसंद करेंगे?

क्या कांग्रेस को पता ही नहीं नेता क्या होता है, और कौन हो सकता है?

नेता एक स्वस्थ व्यक्ति होना चाहिए जो परिस्थिति की मार और वार दोनों को झेल सके। मीडिया द्वारा पहले से ही बताए गए एक संवेदनशील मुद्दे पर दिल के मरीज (दिल का दौरा पड़ने की संभावना उन्हें अधिक होती हैं जिनका ब्लड प्रेशर समान्य नहीं होता है) को किसकी सहमति से भेजा गया? क्या कांग्रेस इसका जबाव देगी? 

उल्लिखित डिबेट में त्यागी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, वे व्यक्तिगत रूप से अपनी बात रखने डिबेट में नहीं थे, वो एक राजनैतिक दल का प्रतिनिधित्व उस समय कर रहे थे जब उनका स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा था।


सेक्युलर - ये वही लोग है जिन्होंने सबसे पहले हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाया, यह वही लोग हैं जो मोदी का नाम लेकर देश में हिंदू मुस्लिम हो रहा है के आरोप समय-समय पर लगाते आए है। इन लोगों के आक्षेप और प्रश्नों के कारण ही मीडिया ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बहस कराकर निष्कर्ष की तरफ जाने का प्रयास करता हैं, तो क्या यह लोग एक राजनीतिज्ञ के निधन की जिम्मेदारी लेंगे?

उठते प्रश्न -

ऐसी विसंगत मानसिकता के लोग कब तक लंगड़े घोड़े रेस में उतार कर सहानुभूति का खेल खेलते रहेंगे? राजनीति में कोई सहानुभूति का स्थान नहीं होता है इसलिए नेता का भावुक होना भी सही नहीं है ऐसे में पात्रा को जिम्मेदार ठहराया जाना कहाँ तक उचित है? यह तो आम आदमी भी जानता है लेकिन महिला की ढाल से राजनीति का अब पैंतरा खेलने वाले एक बार फिर से किसी की मौत से सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि राजनीति के खेल में भी सहानुभूति बटोरी जा सके। ऐसे लोगों से दूरी ही भली, जो राजनीति को खेल समझ उसके मूल भाव और गूढ़ परिभाषाओं से परे हटकर घिनौने खेल, खेल रहे हैं।


 प्रश्न जिससे किए जाने हैं आज वह ही प्रश्न करे तो यहां -

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

की कहावत चरितार्थ हो रहीं हैं। वास्तविकता देखी जाए तो आज कांग्रेस को जबाब देना चाहिए कि उन्हें संवेदनशील मुद्दों पर राय रखने और विरोधी के वार को सहने की आदत नहीं थी या उस समय अपने स्वास्थ्य के कारण ऐसा नहीं कर पाए तो उन्हें ऐसे मुद्दे पर राय रखने क्यो भेजा? यह कोई यकायक आक्षेप नहीं था, यह सब पटकथा से हो रहा था तो कांग्रेस द्वारा उन्हें भेजने की पटकथा किसने लिखी? इसका जबाब तो देना ही चाहिए ताकि लोग समझ सके और उन पर कितना और किस बात का दबाव था? इसका भी खुलासा करना चाहिए।

जिन्हें असहमति हैं वो उचित कारण के साथ कमेंट बॉक्स में आए।

धन्यवाद..

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