भारतीय पीएम हमेशा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बजाय एकतरफा संचार क्यों चुनते हैं? भारत के छद्म लोकतंत्र में किस प्रकार का शासन है

मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नही करते लेकिन उन्होंने प्रेस से जरूर वार्ता की 2019 के चुनावों के दौरान कई मीडिया चैनल,और व्यक्तिगत लोगों को इंटरव्यू किया।..

अब ये छद्मलोकतंत्र कैसे हुआ ?..

क्या लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी???

प्रेस को सूचना चाहिए तो उसके लिए सूचना विभाग है हर मंत्रालय की साइट्स हैं, मीडिया को प्रधानमंत्री या सरकार पर कुछ भी लांछन लगाने पर कोई रोक नही है,देश स्वतंत्र है कोई कुछ भी सच्चा झूठा आरोप लगा सकता है।

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..प्रधानमंत्री लगभग हर महीने "मन की बात" पर जनता से संवाद करते हैं और उससे पहले इसमें प्रश्न भी पूछने का प्राविधान है इसलिए इसे एकतरफा संवाद नही माना जा सकता है।

...ऐसा नही है कि मोदीजी ने कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस न कि हो, मुख्यमंत्री रहते उन्होंने जरूर प्रेस कॉन्फ्रेंस की हैं लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद शायद उन्होंने नही की है और एक बार जरूर की थी बीजेपी के सदस्य के रूप में लेकिन उन्होंने अपना व्यक्तव्य देकर आगे की कार्यवाही/संचालन तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को सौंप दी।

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..अब मैं असली मुद्दे पर आता हूँ, क्यो मोदीजी प्रेस कॉन्फ्रेंस नही करते।

इसके लिए आपको 18साल पहले जाना होगा।2002 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने ही थे तब एक समुदाय के लोगों ने अयोध्या से लौट रहे तीर्थयात्रियों के रेल के एक डिब्बे को बन्द कर उसमें आग लगा दी जिसमें 59लोग जिंदा जलकर खत्म हो गए जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थी,स्वाभाविक था इसकी प्रतिक्रिया हुई थी और दंगों के लिए प्रसिद्ध गुजरात एक बार फिर दंगों की चपेट में आ गया।

....एक मुख्यमंत्री जो कुछ कर सकता है वह सब उन्होनें किया,और दंगों में काफी लोग मारे गए उसमें पुलिस की गोली से मरने वालों में ज्यादातर हिन्दू थे।हालांकि देश में दंगा कोई नई बात नही है,आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी देश में दंगे होते आ रहे हैं लेकिन पत्रकारों के एक विशेष वर्ग ने मोदी को टारगेट करना शुरू कर दिया ।

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एक मुस्लिम पत्रकार राणा अयूब ने तो गुजरात के दंगों पर एक हॉट सेलर बुक लिखी थी "गुजरात फाइल्स"। जब इसी किताब को सुप्रीम कोर्ट में साक्ष्य की तरह पेश किया गया तो कोर्ट ने यह कहते हुए कि इसमें कोई तथ्य नही है और यह सुनी सुनाई बातों का पुलिंदा है, किनारे कर दिया और इसे कोई तवज्जो नही दी।

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....2002 से 2014 तक मोदी एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में उभरे और बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बने और जीते भी फिर दुबारा 2019 में और बड़े बहुमत से जीते।

इस पूरे दौर में पत्रकारों की एक लॉबी गुजरात दंगों से आगे नही बढ़ी,उनके किसी अच्छे काम का जिक्र नही किया।

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मुझे याद है वे एकबार किसी विशेष अवसर पर मोदी हैलीकॉप्टर का दौरा कर रहे थे और उनके साथ एक पत्रकार भी थे जो घूमफिर कर गुजरात के दंगों पर आ गए तो मोदी ने मौन साध दिया और आगे उसकी किसी बात का उत्तर नही दिया।ऐसा ही मैंने एक बार करण थापर से उनका इंटरव्यू दिया लेकिन वह भी घूमफिर कर गुजरात के दंगों पर ही पहुंच गया तो मोदी ने आगे इंटरव्यू ही नही दिया।..गुजरात दंगों के समय केंद्र में कांग्रेस सरकार थी उसने पूरी शक्ति के साथ मोदी को फंसाने के काम किया,शाह को भी गिरफ्तार किया और उनपर दबाव डाला कि वे मोदी के खिलाफ बयान दे लेकिन शाह ने गिफ्तार होना मंजूर किया,राज्य से बाहर निकलना मंजूर किया जिसे आजकल लोग तड़ीपार कह कर उनका मजाक उड़ाते हैं,लेकिन उन्होंने सारी यंत्रणाएँ सहन की लेकिन मोदी के खिलाफ झूठा बयान नही दिया।

मोदी के मुख्यमंत्री रहते उन्हें सीबीआई की जांच का सामना करना पड़ा, उन्हें 9 घण्टे एक अपराधी की तरह ट्रीट किया गया,छोटे कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उनके खिलाफ केस गया, यहां तक कि अपने एक मुख्यमंत्री की बेटी को गुजरात हाई कोर्ट का जज बनाकर केस को प्रभावित करने की कोशिश भी की लेकिन किसी भी अदालत ने उन्हें दोषी नही पाया ।

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यह वही दौर था जब कांग्रेस दुनिया में हिंदुओं को आतंकवादी कई तरह दिखाना चाहती थी,उस दौर में कांग्रेसियों ने अपनी सत्ता का दुरूपयोग कर कई पुलिस अधिकारियों,सेना के अफ़सरों को झूठे मुकदमों में फंसाना शुरू किया था ।



यह सब देखते और जानते हुये कि पत्रकारों की एक लॉबी संवाद नही चाहती बल्कि पत्रकार वार्ता के नाम पर अपने एजेंडे को ही दुहराना चाहती है तो मोदीजी से बजाय press confrence के सीधा सम्वाद शुरू कर दिया।

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...पढ़ने के लिए धन्यवाद आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतज़ार रहेगा ।🙏

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